ढलती उम्र

पता ही नहीं चला ये,
जब जी रहे थे।
होश तो तब आया,
जब चिकित्सक ने ,
बीमारी कि कारण बुढ़ापा बताया।
तबसब कुछ याद आया,
बचपन कब बीता, तरुणाई खिलखिलाई ।
सब अपनेआप होता गया,
कभी सोचा ही नहीं,
कि जी लें जरा।
काम का लिबास हटा,
ठंडी हवा का आनन्द लें जरा।
अगर बुढापा न दे दस्तक तो,
पता ही न लगे कि अब
सांसें भी गिनती की हैं।
वो अपनी उम्र छुपाते हैं।
पर क्या बुढापा रोक पाते हैं?
अपने को छोटा बताते हैं।
पर क्या अपनी ढलती उम्र
रोक पाते हैं?
सबसे कहते हैं, मुझे
नाम से बुलाओ।
अभी तो हम आप सबसे छोटे हैं।
चेहरे को मेकप बंडल बनाते हैं।
बच्चों सी पोशाक पहन, नमूना बन जाते हैं।
सब देखते हैं, ये सोच क्या हुआ इन्हे,
वो खुश हैं आकर्षण का केंद्र बन।
न उमर का लिहाज,
न पहनने का सलीका।
यही है आज के बूढ़ों,
के जीने का तरीका
।उन लोगों को तो खुश होना चाहिए,
वो उनसे खुश-किस्मत हैं,
जोआससुखी जीवन नहीं गुजार पाते हैं।
खुशहाल जीवन बिताते हैं।

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