गिरता भू जल स्तर

पहले मानसून आता था, तो पूरा मौसम सूर्य देव के दर्शन दूभर हो जाते थे।सडकें पानी से लबालब भरी हुई, इतना पानी कि हम एम एस सी का इम्तहान देने गये तो रिक्शे के पहिये पूरे डूबे हुए और पानी गद्दी से जरा नी चे। बस 6बजे सुबह निकलकर साढ़े आठ पर पहुंच पाए। एकबार तो मेरी बेटियों ने साइकल से पानी पार करने की कोशिश की तो बैग नाले में बह गया, वो तो बस भगवान् ने बचा लिया । आज तो जुलाई शुरु हो गई पर बरसात का पता ही नहीं है।चाहे कितनी उमस हो।
वैसे अब करें भी क्या? इतनी ग्लोबल वार्मिग है।
*पेड़ों की अंधाधुंध कटाई।
*पहाड़ खनन।
*प्लास्टिक का अ-धिक तम
प्रयोग।
जो जमीन मे घुलकर कार्बोहाइड्रेट व मिट्टी नहीं बनाती। ये
जमीन के पानी को सडा देती है।
आजकल लोग इसे जमीन में दबा देते हैं। उससे उनका जल सतर नीचे उतर जाता है।
*पहले हर घर में बाग होता था। तब भी घर फटते नहीं थे। आज तो कोई पेड़ लगाता ही नहीं है कि दीवार तोड देगा। घर के बाहर नाली तो होती ही है, उसके बगल में 1फुट जगह

 में पेड लगाए जाएं तोकम सेकम कार्बन डाइ आक्साइड तो सोख ही लेगा।
अगर बड़े फलदार पेड़, 2फुट की क्यारी में, लगाए ं तो ताजे पौष्टिक फल आम, अमरूद, पपीता, अनन्नास, चीकू, लीची जामुन नारियल खजूर, शहतूत, संतरा, मुसम्मीस
भी मिलेंगे और ठंडी छाया भी।

    <li बस यही फल अपने घर की नाली के किनारे ल गाएं तो पानी का स्तर नहीं गिरेगा। फलदार पेड़ों की जड़ें गहराई में जाकर पानी को ऊपर खींच लाती हैं व कार्बनिक व साफ रखती हैं, और जल स्तर गिरता नहीं है।
    *बहुत ज्यादा धुंआ उडाने वाली गाड़ी भी ग्लोबल वार्मिग करती है। इससे जहरीली गैसें बनती हैं। पेड़ केवल कार्बन डाइ आक्साइड सोखते हैं।
    बाकी सब वातावरण में घुल जाती हैं।
    *वातानुकूलित मशीनरी जो घर को मौसम के अनुसार ठंडा व गर्म करती है, भी गलोबल वार्मिग का कारण है। ये कमरों का हवा में मौजूद पानी खींच लेती है व धीरे-धीरे शुष्कता आ जाती है।
    *और घर के बाहर गर्मी छोडने से बाहर और लपट हो जाती है।*इसके स्थान पर ठंडा करने के लिए कूलर व चिपचिपाहट दूर करने के लिए एक्जास्ट लगवाएं।
    हमने तो अपने घर में आम, शहतूत, बादाम लगाए हैं, पपीता लगाया था अब फिर लगाना हैअमरूद, चेरी और नीबू भी। बस बरसात का इंतजार है। अगर पसंद आए तो जरुर ऐसे ही लगवाएं व स्वच्छ वातावरण पाएं।


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