यात्रा संसमरण -2

हम एकबार अपनी दोनों बेटियों के साथ कन्याकुमारी बंगलौर मदुरै गये थे। मदुरै का शानदार मंदिर। बंगलौर मेहमान मेरी बेटी का जन्मदिन मनाया।उस समय व अब के बंगलौर में जमीन आसमान का अंतर है।तब शहर शांत था पर अब कोलाहल पूर्ण है।उस समय करीब 1992का दशक था। मेरी बड़ी बेटी पौने साल कीथी।हम अपने एक पडोसी के घर गये। वो हमें नहीं मिलीं, पर उनके मकान मालिक, न्यू सांद्रा टिप्पा के मालिक ने हम सबको बैठाया व गोद में फूल देकर आशीष दिया। व दूध व डबलरोटी दी।रात के 10 बजे हम सबको उनके घर का मार्ग बताया। न वो हमारी हिन्दी जानते थे न हम उनकी।पर हमें लगा हम अपने घर ही गये हैं।
पर आज का बंगलौर,
उफ
इतनी भीड़भाड़
और
सब लगता है अनजाने चेहरे, जो हिन्दी के नाम से ही नफरत करते हैं।
आज की बंगलौर यात्रा मेरे नवम्बर 2016के ब्लॉग में है।

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