मातृभक्त

कोई जरुरी नहीं की हम अकेले रहें,
शादी होते ही तबादला वापस उत्तर प्रदेश करा लिया।
अकेले तो बाहर रह आए पर अब नहीं।
मां बाप के साथ रहने की इच्छा। पर मां ये समझे तब।
सारा जीवन इसी में निकाल
दिया।
पर मां तो ऐसी कि
आफीसर बनने पर बेटा आगरा क्या गया।
मकान जो मां के नाम था,
बेचने का
विज्ञापन निकाल दिया।
बोर्ड
का इम्तिहान ,
आटो वाले को मनाकर दिया।
बडी बहन ने घर
में लडाई मचाई।
बाप को ह्रदयाघात हुआ।
तब भी शांती नहीं।
बहू बेटे को घर से निकालने की जुगाड़
। बेटा फिर वापस आया मां बाप के साथ रहने,
पर मां का वही रवैया, पैसे की अकड।
बेटे के पीछे पडी,
बहू बेटे को छोडकर मेरे पास रहो।
पैसे का घमंड इतना,
कि बहू को खाना बनाने
के पैसे ये कहकर दे
कि किसी नौकर के आगे

1000रू फेंको तो तलवे चाटेगा और दौडकर सारै काम करेगा।

तेरी इतनी अकड।

कोई नौकर होता तो ले लेता।
कमाती नहीं है, फिर भी नहीं लेती।कौई नौकर होता तो ले लेता।

अब क्या कहें, जब मां के दिमाग की। बेटा उसीकि, पैसे भी उसीके हुए कि नहीं।
बहन तो फोन पर चिंगारी लगाती, भडकाती रहती है,
यै नहीं मालूम कि बुढ़ापा कभी अकड से नहीं गुजरता।
बस अकेले मे बहू को बुलाकर अपनी बडी बेटी
की
तरह गाली देती है।
हर मां एक सी नहीं होती, हर बेटे का परिवार दुष्ट नहीं होता। बस अच्छे घर
को मां ने नर्क बना रखा है।
अब कोई उससे
नहीं बोलता है क्योंकि वो बस बहू को गाली
ही देती है।
ये दुनियां बहुत अजीब है। बेटा मां मां करे नहीं थकता। पर 

सब बच्चे बहू, सबसे खराब व्यवहार, 

क्या ऐसै बूढों क 

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