भागवद गीता

वि ष्णु ने अपनी रचनाओं को जीना ठीक उसी तरह सिखाया व समझाया जैसे एक बाप अपने बेटे के साथ करता है।
विष्णु ने
कृष्ण रुप लेकर अपनी संतानों को जीवन
जीने का तरीका बताया है।उन्होने कहा है,
मैं परमपिता परमात्मा हूँ।
जिस तरह
तुम अपनी संतानों के पिता हो, ठीक वैसे ही मैं भी हूँ।
मैं
सबका पिता हूँ।
मैं जगत के कणकण में हूं।
बस मुझसे कहो,
जैसे तुम अपनी संतान को समझाते हो,
मैं भी समझाता हूँ।
तुम भी अपनी
संतानों
को अच्छा कर्म करने को कहते हो।
मैं भी कहता हूं।
  तुम अपनी संतानों को कहते हो जो करो, मुझे बताकर करो।
मैं भी यही तो कहता हूँ।


बस अंतर ये है कि तुम्हारी सीमाएं हैं, ंमैं अनंत हूँ।

तुम पिता हो, मैं परम पिता।
तुम मार सकते हो, पर मैं शत्रुओं के संहारक के साथ,
निर्माण कर्ता भी हूँ।
भ-भूमि
ग-गगन
व-वायु
अ-अग्नि (ऊर्जा )
न-नीर,
ये ही तो वो पांच तत्व हैं, जो अणु व परमाणुओं से बने हैं।
सब इन्ही से बंना है व इन्ही में मिल जाता है।
पर प्रक्रिया का प्रारम्भ मैं ही करता हूँ।

आज का विज्ञान भी यही है,
तुम पत्थर
पर जोर से मारोगे तो तुम्हे भी जोर से लगेगी।

इसीलिए मैं कहता हूँ, कर्म करो।फल की इच्छा मत करो।,,
वो तो तुमने देख ही लिया कि विज्ञान भी यही कहता है।
अब मैं बताता हूँ, कर्म तीन तरह के हैं,
अन्य पुराने ब्लॉग मे इनका वर्णन हैं। अपने वि चार अवश्य दें।

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