स्त्री

सृष्टि जिसके बिना अधूरी है, 

पर बढते बढते खुद का दुरुपयोग करना शायद स्त्री की आदत बन गयी है।
दिन भर फालतू बैठकर बुराई करना,
फिर कहना कि फलाना हमसे कह रहा था।
ये एक समान्य दिनचर्या का एक अंग बनता जा रहा है।
सुबह उठकर इधर-उधर टहलना, खाने के बाद भी।
पूरे दिन बोलते-बोलते थकती भी नहीं हैं।
आज भी और शुरु हो जाए बस एक बार,
जब तक भट्टा नहीं बैठा देती, 

शांत ही नहीं होती,
कुछ ही गंभीरता से कार्य करती हैं।
जिस राज्य, 

  देश या घर में इनका शासन हो,

 चाहे वो कोई भी हो।।राजनीती व रोजमर्रि की जिंदगी में तो ही है, न हो तो एक बार ससरससरी नजर सब की दिनचर्या पर अवश्य फिराऐं व अगर हो तो  टिप् पणी में बताऐं भ ी।

 ऐसा नहीं है कि सब ऐसी ही हों।
ऐसा क्यों?

मुंह बंद रखें

कुछ को लगातार बोलनै की आदत होती है,

 उन्हें होश नहीं रहता है कि

 कब क्या बोलना है।

क्योंकि मां ने  चुप रहना,  

सिखाया ही नहीं। 

 अपने बच्चों को फालतू बोलने की कला न सिखाऐं।
कभी जबान को लगाम देना नहीं सिखाया।
एक बंदी को हमने कहते
सुना, 

कि

हम तो जब मेरे पती अपने किसी भी दोस्त के जाते हैं

 तोमैं जरूर जाती हूं

 

खूब तीन चार घंटे बातें भी करके आती हूँ। 

 पर पहले तो उनकी पत्नी व बैठतीं थीं, पर अब तो आतीं ही नहीं है।

 

न ही घर जाने पर नमस्ते करतीं है,  न ही बुलाने पर आती है।

वो अपने आपको जाने क्या समझतीं हैं कि बोलना व
आना ही बंद कर दिया।

उन्हें ये नहीं समझ आया कि वो ठलुआ हैं, 

अब एक दिन की बात हो तो चलता है। 

रोज पति के साथ लटक कर चलो, आदमियों की भी बातें होतीं हैं,

कुछ बंदे अपनी पत्नी को कभी भी कुछकहते ही नहीं हैं ।

 जिससे उनकी इज्जत उतरने लगती है व 

तब पता लगता है 

जब अगला संबंध तोड़ लेता है।

 ऐसी नौबत न आने दें, 

कहीं आप भी इसी आदत की शिकार तो नहीँ हैं।


गुझिया

सामग्री :
गाय का या भैंस का दूध,
गरी,
चिरौंजी,
मैदा,
पानी,
तेल
कसार:

पहले 2किलो
गाय का दूध लेते हैं।
फिर उसको
धीमी धीमी आंच पर
करछुल से
चलाकर गाढ़ा करते हैं।
जब वो
घी छोड दे तो समझ लो, कि खोया
बन गया।
अब ठंडा करते हैं।
फिर जितना खोया है उतनी ही शक्कर मिलाते हैं।
फिर
एक मुट्ठी चि रौं जी
व एक मुट्ठी कसी हुई गरी मिलाते हैं।

मैदा:
अब मैदा में थोड़ा थोड़ा मोयन(तेल)
देते हैं कि तलने पर कुरकुरा
हो व
हाथ से अच्छे से मसलते हैं,
व मुट्ठी
से बांधकर देखते हैं,
जब मैदा बंध जाऐ तब पानी मिलाकर
अच्छे से आटा गूंथते हैं व पिट्ठी बनाते हैं।
गूंथी हुई मैदा की लम्बी लोई बनाकर चाकू से पूड़ी बेलने लायक लोई बनाकर एक सूती कपड़े से ढक देते हैँ कि सूख न जाए।अब लोई की पूड़ी बेलकर एक चम्मच कसार भरकर, मैदा घुले पानी से चिपका एक सा कपड़े पर रखकर ढक देते हैँ। ऐसे हीसब बना लेते हैँ , 30 या40गुझिया बनाकर गरम तेल में धीमी आंच पर तलते हैं।

 

मां दुर्गा के नव वर्ष पर,  नौ रूप

28मार्च,विक्रम संवत 2074 आज है।
हम हिन्दू का नव वर्ष ,।
अब नौ दिन मां अलग अलग रुप में आती हैं।
जब मां ने पृथ्वी पर शत्र का संहार किया, वो यही दिन थे।
आज प्रभु श्रीराम का राज तिलक हुआ था।

जनता

सडकें तालाब बनी हैं,
नदी नालों में बदल गयी हैं। 

सडकोंb> पर सुरक्षा नहीं है, 

किसानमर रहे हैं, 

बिना पढे
डिग्री मिल रही हैफिर भी यह सालों से चल रहा है।

किसी ने विरोध नहीं किया।
अगर अब सरकार पढाकर,

 वैध लाइसेंस द्वारा हर काम कराना चाहती है, 

तो जनता विरोध क्यों करती है?
जनता को

 शायद नहीं मालूम कि पढकर काम करने पर

 कोई उसे बेवकूफ बनाकर, जमीन जायदादया कुछ भी नहीं छीन सकता है।

क्योंकि वो पढ लेगाकि पेपर में

क्या लिखा है?

“सड़कों पर घूमते आवारा पशुओं में टेपवर्म, हुक वर्म,फाइलेरिया आदि बीमारियाँ होती हैं।”

अगर सरकार वैध तरीके से 

पोल्ट्री फार्म,   

बकरी पालन 

भैंस पालन व 

अन्य तरीके से काम कराना चाहती है तो इसमें बुराई नहीं है, 

कया फिर आप अच्छे से संस्थान से अच्छा जानवर का मीट अपने घरवालों को खाने को नहीं देंगे?

क्या फिर आपके कुटुम्बी स्वजन स्वस्थ नहीं रहें गे? गा

गाय का मीट सबसे ज्यादा नुकसान करता हैजैसै, गाय का दूध बसे ज्यादा फायदा करता है।,

पालते तो सब हैं, गाय की खासियत यही है कि उसका दूध जितना फायदा करता है,
मीट उतना ही नुकसानदेह है।

इन जानकारी के लिए विज्ञान पढना जरूरी है। 

कहने से कुम्हार गधे पर नहीं चढ़ता।, ये कहावत च रितार्थ होती है। 

इसमें किसी धर्म नहीं, सबके लिए एक ही नियम है।
अगर कोई इसपर भड़कता है, 

इसका सीधा अर्थ है कि वो जनता को बीमार, अनपढ देखना चाहता है। 

वो खुद व उसका परिवार तो पढा लिखा होता है। 

ये जो भी पढे, 

ये जरुर वॉच करे

 कि क्या भडकाने वाले, 

या उसकी कोई एक संतान

बहुत ज्यादा पढा होता है

व खुद तो शांत बैठता है 

पर जनता को बस यूं हु

भडकाकर सत्ता सुख भोगता हो।

इसलिये जागो,    

अगर आप भारत को अपना देश व खुद को भारत का नागरिक जो कि बाहर आपकी पहचान है। 
हिंदू (मुसलिम पंडित कायस्थ क्षत्रिय वैश्य व अन्य , हम किसी को द लित नहीं मानते, ससब अन्य जाति हैं ) मानते हैं 

 तो आप धैर्य रखें, 

भड़काने वालों की बातों में न इकर किसी का वोट बैंक न बने।


 हिंदू भीमीट खाता है, पर गरीब मुसलिम व किसान व अन्य जात को पढने नहीँ दिया गया, कि वह कोई और काम कर रोजगार करे।

आप किसी पढे लिखे से कहो, क्यइ वो खुद दुकान पर बैठकर ये काम कर धन बनाना पसंद करेगा?

आप पन्नी के थैले पसंद करते हैं,इससे कहीं सामान नहीं ले जाना पड़ता है।
पर कभी इसका असर देखा है,
इसे कहीं जलाए ं
या नष्ट करें,
ये नष्ट नहीं होती है,

इसमें कोई फल रख दें तो सड़ जाता है,
पानी बांध कर रख दें
तो दो दिन में महककर खराब हो जाहै,
ये आप कुऐं व हैंड पम्प व नदी तालाब का पानी पीते हैं
तो वो भी इसके
जमीन में होने से खराब व जहरीला हो जाता है।
क्या
आप जहरीला पानी पीना चाहें गे?
सरकार इसे कहीं न कही तोदबाऐगी,
इसको जलाने से भी हवा जहरीली हो जाती है। क्या आप साफ पानी नहीं पीना चाहते हैं।

आरक्षण 

में भी यही बातहै, किसी खास जाति को आरक्षण(बिना पढे पास) दो, फिरजब कोई धोखा करे तो  कंगाल हो जाओ।। 

हार्दिक पटेल ने कहा था, कि धन वो नेता क्यों बना?

बस यही हरेक करता है।
जागो जनता सारी, अब सोचो हर।
टैक्स
कभी सोचा सब टैक्स माफ कर दिऐ तो सरकारकहां से सुविधाएँ देगी? सडक बिजली पानी घर व वैध रजिस्टर्ड बिज़नेस।
हमने केंद्र सरकार को दिया, तभी तो राज्य सरकार को देगी।
राज्य सरकार अगर सब मुफ्त देगी तोजनता की तनख्वाह हड़प लेगी।

 

विक्नरम संवत 2074, नव वर्ष की मंगल कामनाऐं(चैत्र की मां नव दुर्गा)

आज सुबह देवी दुर्गा,
जो अपने भक्तों का उद्धार करने के लिए
सदैव तत्पर हैं, अपने घर भक्तों के पास आती हैं।
मां अपने भक्तों पर कृपा करती हैं।
वो हमेशा पहाड़ में जंगल
में बहुत
ऊंचाई पर निवास करती हैं।
मां को ब्रह्मा,
विष्णु , महेश , तीनों की
शक्ति यों ने
मिलकर बनाया है।।
[राक्षस दुर्गम नै एक बार तप कर भगवान् से वरदान
मांगा कि मैं किसी के
हाथों से न मरूं,
पर (कन्या) कहना भूल गया।}
बस
अत्याचारों
की बाढ़ आ गयी,त्राहि-त्राहि मच गयी।
होना क्या था,
कैलाश पर्वत, जो इस समय चाइना में है, सब इंद्र के साथ दौड़ के वहाँ गये।जहां पशुपतिनाथ रहते हैं, वो गंगा जी का वेग सम्भालने में लगे थे, ने कहा,
वि ष्णु के पास जाओ।
विष्णु ने कहा,
ब्रह्मा जी के पास जाओ,
अब ब्रह्मा जी ने बताया

कि उसने ये वरदान मांगा था।
सभा हुई, सबसे बुद्धि मान
ि वष्णु ने कहा, वो कन्या तो कहना भूल ही गया।
अब ये तय हुआ कि गौरी,
लक्ष्मी
, सरस्वती,
तीनों ने मिलकर एक कन्या रूप लिया
व दुर्गा नाम रखा।
और अपनी समस्त ताकत दुर्गा को दे दी।

(जहां, स्वर्ग से सीधे गंगा जी
शिव की जटाओं में
उतरीं थीं, येकहकर कि मुझे सम्भालने के
लिऐ शंकर जी से प्रार्थना करो, मुझमें
बहुत वेग है,मुझे केवल भोलेनाथ ही सम्भाल सकते हैं।
उनसे कहो कि वो जटाओं को खोलकर बैठें,
मैं जटाओं में उतर
आऊंगी। )
इन जटाशंकर की पत्नी पार्वतीजी,
वरदान देने वाले ब्रह्मा जी की पत्नी सरस्वती जी,
जो विद्या देती हैं
व विष्णु की लक्ष्मी तीनों ने मिलकर
जब अवतार लिया तो दुर्गा जंगल में
घूमने निकल गयी।अब कन्या को अकेले पाकर वो
तो बदमाशी पर उतर आया और पकड़ ने को अपने अनुचरों को भेजा,
अति करने पर दुर्गा के हाथों मारा गया।

सार यह है कि 

अगर हम नववर्ष पर दुर्गा का आवाहन करते हैँ

 तो त्रिदेव का वरदहस्त अपनी पत्नी के साथ
हम पर, पूरे वर्ष रहता है।
जब हमारा
हर कार्य भी हिंदी कलैंडर से
होता है,
फिर इसे मानने में
हिचक कैसी?